फिल्टर वाली झूठी दुनिया में कुछ नहीं रखा, क्योंकि झुर्रियों में उम्र ढलती नहीं, संवरती है; उर्वशी दत्त बाली

काशीपुर। समाजसेविका और डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली समाज में महिलाओं में मची एक होड़ के प्रति चिंता जताते हुए कहती हैं कि आज का दौर एक अजीब सी अंधी दौड़ में फंसा दिखाई दे रहा है। समझ नहीं आता कि औरतें अपने ही चेहरे पर सुइयों, केमिकल्स और दवाइयों का बेवजह मोर्चा क्यों खोले हुए हैं?
जब रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अस्पतालों और दवाइयों के अपने तनाव कम नहीं हैं, तो फिर खुद को दर्द देकर चेहरे पर अनचाहे कॉस्मेटिक एक्सपेरिमेंट क्यों?उर्वशी दत्त बाली के अनुसार, आज कितनी ही महिलाएं सिर्फ फिल्टर वाली बेदाग़ त्वचा पाने के लिए क्लीनिकों के चक्कर काट रही हैं। वे त्वचा की उन तजुर्बेकार लकीरों को मिटाने में लगी हैं जो लकीरें हमें बढ़ती उम्र के साथ कुदरत ने दी है और वास्तव में बुढ़ापे की कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन के संघर्ष, हिम्मत और तजुर्बे का मुकम्मल प्रमाण हैं। बेहद अफसोस है कि इंजेक्शनों, बोटॉक्स और दवाइयों के सहारे इन स्वाभाविक रेखाओं को मिटाने का यह पागलपन समाज को किस दिशा में ले जा रहा है? यह रुकना चाहिए।सोशल मीडिया के फिल्टरों की झूठी दुनिया ने ‘ग्लास क्लियर स्किन’ का एक ऐसा भ्रम रच दिया है कि 40 और 50 की उम्र में भी 20 का दिखने की अंधी होड़ मची है। सुंदरता का पैमाना सिर्फ चेहरे की कसावट और बेदाग़ दिखने तक सीमित कर दिया गया है। लोगों का ध्यान इस बुनियादी सच से पूरी तरह भटक चुका है कि सुंदरता तन की नहीं बल्कि सोच सुंदर होनी चाहिए, व्यवहार में शालीनता और मन में सादगी होनी चाहिए।
उर्वशी दत्त बाली कहती हैं किमहिलाओं को गंभीरता से सोचना चाहिए की इस दौड़ में पुरुष क्यों नहीं? औरतें ही क्यों भागती हैं क्लीनिक की ओर? इस बनावटी दौड़ के पीछे की कड़वी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सच्चाई उजागर करते हुए श्रीमती बाली सवाल उठाती हैं कि कभी गौर किया है कि पुरुष इन बोटॉक्स, सुइयों और सर्जरी के चक्करों में क्यों नहीं पड़ते?पुरुष अपने सफेद बालों और चेहरे की झुर्रियों को अपनी परिपक्वता, रुतबे और तजुर्बे की निशानी मानकर गर्व से जीते हैं। उन्हें समाज यह अहसास नहीं कराता कि उम्र का बढ़ना कोई अपराध है। लेकिन विडंबना यह है कि औरतों के ज़हन में बचपन से ही यह असुरक्षा भर दी जाती है कि उनका वजूद, सम्मान और आकर्षण सिर्फ उनकी जवानी और बेदाग़ त्वचा तक सीमित है।इसी सामाजिक दबाव और हीन भावना की शिकार होकर महिलाएं ‘परफेक्ट’ दिखने के जाल में उलझ जाती हैं। वे महंगे और दर्दनाक क्लिनिकों के चक्कर काट-काटकर न केवल खुद को मानसिक तनाव में झोंकती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी और अन्य साधारण महिलाओं के लिए भी एक बहुत गलत मिसाल पेश कर रही हैं।
समय-समय पर समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों और गलत धारणाओं के प्रति बेबाक टिप्पणी कर वास्तविकता का आईना दिखाने वाली समाज सेविका उर्वशी दत्त बाली कहती हैं कि बनावटी खूबसूरती से मिलने वाली चंद पलों की झूठी तारीफ के लिए अपनी सहजता और सुकून को दांव पर लगाना कहां की समझदारी है? हमारा महिला जगत सीधी, सरल और गरिमामयी ज़िंदगी जीने से क्यों कतरा रहा है? आप 80- 90 साल की हीरोइन को देखिए,,, अगर इन सुइयों और दवाइयों में इतना दम होता, तो क्या हमेशा हिंदुस्तान के बड़े पर्दों और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर छाई रही और चमकते हुए तारों की तरह ग्लैमरस दुनिया में रही, यह हीरोइनें भी अपने चेहरे की झुरिया ना मिटवा लेती, और आप सिर्फ अपनी फेसबुक इंस्टाग्राम की चंद फॉलोअर्स की झूठी दुनिया के लिए उफ़्फ़,,,
कभी ठहरकर सोचिए, क्या वाकई 20 की उम्र ही जीवन का सबसे मुकम्मल मोड़ थी?
उस उम्र में ऊर्जा तो थी, पर एक कच्चापन भी था। जीवन के मायने समझने की बेचैनी और खुद को साबित करने की छटपटाहट थी। ज़िंदगी का कोई तजुर्बा नहीं था— कौन अपना है, कौन पराया, कौन क्या सोच रहा है और कौन कहाँ तक साथ निभाएगा, कुछ भी तो मालूम नहीं था।
उर्वशी दत्त बाली का स्पष्ट कहना है कि थोड़ा सा रुककर आत्ममंथन कीजिए— आज उम्र के इस पड़ाव पर जो हमारे पास है, वह उस कच्ची उम्र में कभी नहीं था। आज हमारे पास जीवन की गहरी समझ है, ज़िंदगी के हर मोर्चे से लड़कर जीता गया हौसला है और भीतर का एक शांत ठहराव है। यही ठहराव और आत्म-स्वीकृति आज हमारे चेहरे का असली नूर है, जिसे दुनिया का कोई भी कॉस्मेटिक क्लिनिक या इंजेक्शन नहीं दे सकता।
धूप-छांव से गुज़रे इस हसीन सफर के निशानों और संघर्षों को किसी केमिकल के पीछे छुपाने की आख़िर ज़रूरत क्या है?बालों में आई चाँदी कोई ढलती उम्र की मजबूरी नहीं, ज़िंदगी के अनुभवों का पहनाया हुआ मुकुट है। इस चाँदी पर झेंपने के बजाय गर्व से इतराइए और आईने के सामने खड़े होकर सालों को गिनना बंद कीजिए।हर उम्र का अपना एक अनूठा सौंदर्य, गरिमा और आत्मसम्मान होता है। जब ज़िंदगी खुद एक साधना और संघर्ष है, तो उसे किसी बनावटी मुखौटे की दरकार नहीं। इस खूबसूरत पड़ाव को सादगी, स्वाभिमान और ग्रेस के साथ खुलकर जिएं। उर्वशी दत्त बाली का समाज को यही खरा और सीधा संदेश है कि ज़िंदगी ढल नहीं रही, बल्कि अपने सबसे परिपक्व, सशक्त और हसीन रूप में खिल रही है आओ जिंदगी की इस हकीकत को हकीकत से जीएं।
