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संत तो संतता से है न कि बाहरी वेशभूषा या दिखावा से: चैतन्य महाप्रभु

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काशीपुर। स्वामी श्री हरि चैतन्यपुरी जी महाराज ने आज गढ़ीनेगी स्थित श्रीहरि कृपाधाम आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि यदि संतता के मार्ग पर चलना चाहे तो अपने अंदर क्षमा, करुणा, उदारता, कृपा आदि सद्गुणों को अपनाएं। संत तो संतता के गुणों से है ना कि बाहरी वेशभूषा, दिखावा इत्यादि से। साधु, भक्त या महात्मा बनकर जो लोगों को धोखा देते हैं वे स्वयं को धोखा देते हैं व अपना जीवन पापमय बनाते हैं। दूसरों का अहित चाहने वाले या करने वाले का कभी हित नहीं होता। पतन या पाप का कारण प्रारब्ध नहीं है बल्कि विवेक अनादर करके कामना के वश में होने पर मनुष्य पापाचरण करता है तभी उसका पतन होता है। किसी भी स्थिति अवस्था, प्राणी, पदार्थ, वस्तु आदि से जो सुख की कामना रखता है वह कभी सुखी नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि असत्य, अधर्म, अन्याय व बुराई हो सकता है कि हमें कुछ समय के लिए फलते फूलते से प्रतीत हों परंतु अंत में विजय सत्य, धर्म व अच्छाई की होगी। उन्होंने कहा कि आज लोगों के धर्म से विमुख होने के कारण ही मानवता की कमी भी दिखाई देने लगी है। हमें समाज को बदलने के लिए लोगों की दृष्टि बदलने की आवश्यकता है। इस दौरान आश्रम में अपार जनसैलाब उमड़ा था।

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