स्वच्छता की लड़ाई केवल सफाई कर्मचारियों या चुनिंदा संस्थाओं के दम पर नहीं जीती जा सकती: उर्वशी बाली

काशीपुर। समाजसेविका श्रीमती उर्वशी दत्त बाली जागरूकता का संदेश देते हुए कहती हैं कि हम अक्सर सार्वजनिक स्थानों की बदहाली का रोना तो रोते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि यह बदहाली किसी बाहरी ताकत की वजह से नहीं, बल्कि हमारे अपने गैर-जिम्मेदाराना रवैये की ही देन है।
श्रीमती बाली ने कहा कि चाहे जीवनदायिनी नदियां हों या फिर हमारी आस्था के धार्मिक स्थल अथवा हमारी अपनी आवासीय कॉलोनियां या चहल-पहल से भरे बाजार, गंदगी फैलाने की हमारी बीमारी हर जगह पसरी हुई है। वह कहती हैं कि कूड़ा साफ करने में जो ताकत और संसाधन लगते हैं, उससे कहीं अधिक आसान है हाथ में थामे कचरे को सड़क, नाली या नदी में उछाल देना। अफसोस कि हम बुनियादी नागरिक शिष्टाचार को भी भूलते जा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि लोग अपने घर के भीतर तो चमक-धमक रखते हैं, लेकिन घर का कूड़ा सीधे कॉलोनी की खाली जमीन, सड़क के कोने या नालियों में फेंकने में जरा भी हिचक नहीं दिखाते। उर्वशी बाली ने कहा कि स्थानीय स्कूलों और कॉलेजों के स्तर पर केवल ‘रिवर अडॉप्शन’ ;नदियों व घाटों को गोद लेनाद्ध ही नहीं, बल्कि ‘वार्ड व मार्केट अडॉप्शन’ जैसी पहल भी शुरू की जाए। इससे यह होगा कि जब छात्र-छात्राएं अपनी-अपनी कॉलोनियों, गलियों और नजदीकी बाजारों की स्वच्छता की जिम्मेदारी लेंगे, तो एक बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिलेगा।
