मोबाइल या दोस्त: जिंदगी में कौन ज्यादा अपना: उर्वशी बाली

काशीपुर। डी-बाली ग्रुप की डायरेक्टर एवं समाजसेवी उर्वशी दत्त बाली जिंदगी के प्रति बहुत संजीदा है। उनकी नजर में मोबाइल संचार क्रांति तो लाया है मगर उसने हमारी जिंदगी के रंगों को भी छीना है। अभी भी समय है यदि हमने सावधानी न बरती तो मोबाइल हमें बहुत कुछ देगा मगर सब कुछ छीन भी लेगा। मोबाइल ने भौतिक दूरियों को तो घटाया है मगर दिलों की दूरियां इतनी बढ़ा दी हैं कि पास पास बैठे लोगों में भी संवाद नहीं क्योंकि मोबाइल से पीछा छूटे तो समय निकले। हमें समझना होगा कि मोबाइल हमारे लिए है ना कि हम मोबाइल के लिए।
उर्वशी बाली रहती है कि मोबाइल वाली जिंदगी में से बहुत कुछ निकल गया है और आज स्थिति यह है कि हमें अपनों से ही बात करने का समय नहीं है। वह कहती हैं कि जैसे-जैसे वह समाज में बाहर निकलती हैं, लोगों के व्यवहार को करीब से महसूस करती हैं। देखने को मिलता है की मिलने का तरीका बदल गया है, रिश्तों और दोस्तियों में वह गर्मजोशी, वह खिंचाव अब दिखाई नहीं देता। लगता है जैसे प्यार कहीं खो सा गया हो। अब लोग उतना ही बोलते हैं, उतना ही मिलते हैं, जितना एक फोटो या वीडियो रील बनाने के लिए ज़रूरी होकृताकि सोशल मीडिया पर अपलोड कर यह दिखाया जा सके कि हमारी जिंदगी बहुत व्यस्त है, हमारे बहुत दोस्त हैं। हकीकत में यह दोस्ती नहीं, सिर्फ दिखावा बनकर रह गई हैकृएक झूठी सी दुनिया, जिसमें प्यार नहीं बल्कि प्रदर्शन है।
