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काशीपुर में गोविषाण टीले की खुदाई में मिलीं प्राचीन संरचनाए

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काशीपुर में गोविषाण टीले की खुदाई में मिलीं प्राचीन संरचनाए

काशीपुर में गोविषाण टीले की खुदाई में मिलीं प्राचीन संरचनाए
काशीपुर में गोविषाण टीले की खुदाई में मिलीं प्राचीन संरचनाए

काशीपुर। काशीपुर की ऐतिहासिक पहचान और प्राचीन विरासत से जुड़े गोविषाण टीले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ;एएसआईद्ध देहरादून की ओर से कराए गए उत्खनन ने क्षेत्र के इतिहास को लेकर नई उत्सुकता पैदा कर दी है। खुदाई के दौरान जमीन के भीतर से प्राचीन ईंटों से निर्मित कई अवशेष सामने आए हैं, जिनमें दीवारनुमा निर्माण के साथ एक गोलाकार आकृति वाली संरचना भी शामिल है।
प्रारंभिक निरीक्षण में इन निर्माण अवशेषों का संबंध गुप्त अथवा कुषाण काल से होने की संभावना व्यक्त की जा रही है, लेकिन पुरातत्व विशेषज्ञों ने अभी किसी निश्चित कालखंड पर मुहर लगाने से इनकार किया है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी पुरातात्विक स्थल के संबंध में अंतिम निष्कर्ष केवल प्रारंभिक दृश्य निरीक्षण के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए संरचनाओं की बनावट, निर्माण शैली, इस्तेमाल की गई सामग्री, आसपास मिलने वाले अवशेष और खुदाई की विभिन्न परतों का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन आवश्यक होता है। फिलहाल गोविषाण टीले से प्राप्त सामग्री में ऐसी कोई विशिष्ट पुरातात्विक वस्तु नहीं मिली है, जिसके आधार पर यह प्रमाणित किया जा सके कि सामने आया निर्माण किसी एक निश्चित काल से ही जुड़ा है। इसके बावजूद प्राचीन ईंटों की मौजूदगी और धरातल के भीतर से निकल रही संरचनाएं इस स्थल के पुरातात्विक महत्व को और गहरा कर रही हैं। स्थानीय स्तर पर इसे काशीपुर के अतीत से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, जबकि एएसआई की टीम आगे की खुदाई और अध्ययन के माध्यम से इन अवशेषों की वास्तविक उम्र, उपयोग और ऐतिहासिक संदर्भ को समझने की दिशा में काम करेगी। यदि आगामी चरण में इससे संबंधित प्रमाणिक सामग्री प्राप्त होती है तो गोविषाण टीला उत्तराखंड की प्राचीन सभ्यता, स्थापत्य परंपरा और तत्कालीन जीवनशैली को समझने के लिए महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में और अधिक सामने आ सकता है। इस उत्खनन ने इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोगों के बीच भी इस स्थल को लेकर उम्मीदें बढ़ा दी हैं। बताया गया कि गोविषाण टीले पर उत्खनन अभियान की शुरुआत पिछले माह कुमांऊ कमिश्नर दीपक रावत द्वारा की गई थी, जिसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देहरादून की टीम ने स्थल पर खुदाई का कार्य आगे बढ़ाया। उत्खनन के दौरान मिट्टी की विभिन्न परतों को सावधानीपूर्वक हटाने पर कुछ स्थानों पर ईंटों से तैयार दीवार जैसी बनावट दिखाई दी। इसी क्रम में एक गोल आकार का निर्माण भी सामने आया, जिसे पहली नजर में कुएं के समान माना जा रहा है। हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग देहरादून के अधीक्षक एमसी जोशी ने स्पष्ट किया है कि अभी इस आकृति को निश्चित रूप से कुआं घोषित करना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि गोलाकार संरचना की प्रकृति, गहराई, निर्माण तकनीक और उसका संभावित उपयोग समझने के लिए विस्तृत जांच जरूरी है। उधर, मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों ने गोविषाण टीले पर जारी उत्खनन की गति को फिलहाल थाम दिया है। लगातार बारिश के कारण स्थल पर खुदाई का कार्य अस्थायी रूप से रोकना पड़ा है, ताकि सामने आए प्राचीन अवशेषों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे और पुरातात्विक कार्य वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप सुरक्षित ढंग से किया जा सके। मौसम सामान्य होने के बाद लगभग 15 अक्टूबर से दोबारा उत्खनन शुरू करने की प्रक्रिया प्रस्तावित है। इसके पश्चात टीम पहले से सामने आए निर्माणों का व्यवस्थित निरीक्षण करेगी और आवश्यकतानुसार खुदाई को आगे बढ़ाया जाएगा।